क्‍या तुम्‍हारा दुख उससे बड़ा है ….???

सात साल की वो मासूम जो कचरे के ढेर से एक जोड़ी चप्‍पल मिलने पर खुश है
अपनी छोटी बहन को पहना कर नाप देखती, फिर उतारती फिर पहनाती और …..मायूस हो जाती, सही माप न आने पर फिर लग जाती Continue reading

सेक्‍स नैतिक या अनैतिक (भाग-2)

हास्‍य और सेक्‍स के बीच क्‍या संबंध है–

जो लोग सुंदर ढंग से प्‍यार कर सकते है वे कभी विध्वंसात्मक नहीं हो सकते। और जो लोग सुंदर ढंग से प्रेम कर सकते है और जीवन का आनंद मना सकते हे वे प्रतियोगिक भी नहीं होंगे। 

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इनमें निश्‍चित संबंध है; संबंध बहुत सामान्‍य है। सेक्‍स का चरमोत्कर्ष और हंसी Continue reading

सेक्‍स नैतिक या अनैतिक (भाग-1)

पश्‍चिम के लिए यह स्‍वीकारना बहुत मुश्‍किल है कि सेक्‍स का बिदा होना आनंद और अनंत का आशीर्वाद की तरह हो सकता है। क्‍योंकि वे मात्र भौतिक शरीर में ही विश्‍वास करते है। किसी भी पल काम तृप्‍ति का आनंद लेने के लिए सेक्‍स एक साधन मात्र है। 

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सेक्‍स से संबंधित किसी नैतिकता का कोई भविष्‍य नहीं है। सच तो यह है कि सेक्‍स और नैतिकता के संयोजन ने नैतिकता के सारे अतीत को विषैला कर दिया है। Continue reading

अघोर – अर्थात जो घोर न हो, सरल हो, सहज हो

अघोर का ही अपभ्रंश शब्द है—औघड़। औघड़ और अघोर शब्द समानार्थी हैं। इसका अर्थ है जो घोर न हो अर्थात् जो भयानक, क्रूर, कठोर, दुरुह, कठिन पीड़ादायक न हो यानि सरल, सुहावना, मंगलकारी हो।

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आप मेरे द्वारा की जा रही अघोर शब्द की व्याख्या पर चौंके रहे होंगे, परन्तु यह सत्य अर्थ है कि जो भयानक न हो, यानी जो घोर न हो, वही अघोर होता है। Continue reading

सप्त चक्र भेदन – एक सहज, सरल तथा सुरक्षित तांत्रिक योग विधि -2

चक्रों मे ध्यान सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखे! Continue reading

सप्त चक्र भेदन – एक सहज, सरल तथा सुरक्षित तांत्रिक योग विधि

ज्ञानेंद्रियों के व्यापार को बंद करना—ज्ञानेंद्रिय शक्ति प्रदान क्रियाए……..
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। Continue reading

कैसे साधे अजपा जप: प्राण – अपान और जप

कैसे साधे अजपा जप: प्राण – अपान और जप
बहुत से योगी अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं और उसी प्रकार प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं इससे सूक्ष्म अवस्था हो जाने पर अन्य योगीजन प्राण और अपान दोनों की गति रोककर प्राणायामपरायण हो जाते हैं।

जिसे श्रीकृष्ण प्राण – अपान कहते हैं, उसी को महात्मा बुद्ध ‘अनापान’ कहते हैं। इसी को उन्होंने श्वास – प्रश्वास भी कहा है। प्राण वह श्वास है Continue reading