What Lord Ganesha symbolizes – गणेशजी की प्रथम पूजा क्यों ?

पूजा की यथार्थता यह है कि कोई योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि जब कभी भी साधना शुरू करते हैं तो सर्वप्रथम मूलाधार चक्र के देवता गणेश जी के क्षेत्र से ही गुजरना पड़ता है, इसीलिए सर्वप्रथम पूजा गणेश जी की नियत हो गयी।

पूजा की यथार्थता यह है कि कोई योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि जब कभी भी साधना शुरू करते हैं तो सर्वप्रथम मूलाधार चक्र के देवता गणेश जी के क्षेत्र से ही गुजरना पड़ता है, इसीलिए सर्वप्रथम पूजा गणेश जी की नियत हो गयी।

सामान्यतः देखा और सुना जाता है कि सर्वप्रथम पूजा गणेश जी की जाती है अथवा होती है। इस पर यह प्रश्न बनता है कि क्यों ? – सामान्यतः जाना और देखा भी जाता है कि मानव समाज योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि द्वारा ही निर्देशित किया जाता है। अब देखें कि योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि जब साधना करते हैं Continue reading

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अघोर – अर्थात जो घोर न हो, सरल हो, सहज हो

अघोर का ही अपभ्रंश शब्द है—औघड़। औघड़ और अघोर शब्द समानार्थी हैं। इसका अर्थ है जो घोर न हो अर्थात् जो भयानक, क्रूर, कठोर, दुरुह, कठिन पीड़ादायक न हो यानि सरल, सुहावना, मंगलकारी हो।

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आप मेरे द्वारा की जा रही अघोर शब्द की व्याख्या पर चौंके रहे होंगे, परन्तु यह सत्य अर्थ है कि जो भयानक न हो, यानी जो घोर न हो, वही अघोर होता है। Continue reading

सप्त चक्र भेदन – एक सहज, सरल तथा सुरक्षित तांत्रिक योग विधि -2

चक्रों मे ध्यान सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। कूटस्थ मे दृष्टि रखे! Continue reading

सप्त चक्र भेदन – एक सहज, सरल तथा सुरक्षित तांत्रिक योग विधि

ज्ञानेंद्रियों के व्यापार को बंद करना—ज्ञानेंद्रिय शक्ति प्रदान क्रियाए……..
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। Continue reading

कैसे साधे अजपा जप: प्राण – अपान और जप

कैसे साधे अजपा जप: प्राण – अपान और जप
बहुत से योगी अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं और उसी प्रकार प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं इससे सूक्ष्म अवस्था हो जाने पर अन्य योगीजन प्राण और अपान दोनों की गति रोककर प्राणायामपरायण हो जाते हैं।

जिसे श्रीकृष्ण प्राण – अपान कहते हैं, उसी को महात्मा बुद्ध ‘अनापान’ कहते हैं। इसी को उन्होंने श्वास – प्रश्वास भी कहा है। प्राण वह श्वास है Continue reading