What Lord Ganesha symbolizes – गणेशजी की प्रथम पूजा क्यों ?

पूजा की यथार्थता यह है कि कोई योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि जब कभी भी साधना शुरू करते हैं तो सर्वप्रथम मूलाधार चक्र के देवता गणेश जी के क्षेत्र से ही गुजरना पड़ता है, इसीलिए सर्वप्रथम पूजा गणेश जी की नियत हो गयी।

पूजा की यथार्थता यह है कि कोई योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि जब कभी भी साधना शुरू करते हैं तो सर्वप्रथम मूलाधार चक्र के देवता गणेश जी के क्षेत्र से ही गुजरना पड़ता है, इसीलिए सर्वप्रथम पूजा गणेश जी की नियत हो गयी।

सामान्यतः देखा और सुना जाता है कि सर्वप्रथम पूजा गणेश जी की जाती है अथवा होती है। इस पर यह प्रश्न बनता है कि क्यों ? – सामान्यतः जाना और देखा भी जाता है कि मानव समाज योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि द्वारा ही निर्देशित किया जाता है। अब देखें कि योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि जब साधना करते हैं तो साधना के अन्तर्गत जो प्रमुख सिद्ध स्थल जैसे मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत्, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार हैं जिनमें सर्वप्रथम मूलाधार चक्र ही पड़ता है जिसके अभीष्ट देवता गणेश जी नियत हैं। यही कारण है कि सर्वप्रथम पूजा गणेश जी की होने लगी।

गणेश जी सर्वप्रथम पूजित होने के बावजूद भी श्रेष्ठतम् नहीं :-
यह बात सत्य है कि गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम होती है परन्तु इसका अर्थ भूल एवं भ्रमवश यह नहीं मान लेना चाहिए कि सबसे श्रेष्ठ देवता गणेश जी ही हैं, इसलिए इनकी पूजा सर्वप्रथम की जाती है। इनसे बड़े तो इनके बाद स्वाधिष्ठान के अभीष्ट देवता इन्द्र ही हैं, इन दोनों से बड़े मणिपूरक स्थित ब्रह्मा जी हैं, इन तीनों से बड़े अनाहत् के देवता विष्णु जी हैं, इन चारों से बड़े विशुद्ध के देवता शंकर जी हैं, इन पाँचों से बड़े तो शब्द-शक्ति अथवा ब्रह्म-शक्ति रूप आत्मा नियत है और इन सभी से श्रेष्ठ गुरु होते हैं जो सहस्रार में वर और अभय मुद्रा में पड़े रहते हैं। इतना ही नहीं गणेश जी से बड़े तो उन्ही के चक्र मूलाधार में ही रहने वाली कुण्डलिनी शक्ति और मूलरूप शिव-लिंग ही होते हैं क्योंकि शिव-शक्ति से गणेश की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार अब तो समझ में आ ही गया होगा कि सर्वप्रथम पूजा का भाव यह नहीं है कि गणेश जी सबसे बड़े देवता हैं।

सर्वप्रथम पूजा की यथार्थता यह है कि कोई योगी-यति, ऋषि-महर्षि, सन्त-महात्मा आदि जब कभी भी साधना शुरू करते हैं तो सर्वप्रथम मूलाधार चक्र के देवता गणेश जी के क्षेत्र से ही गुजरना पड़ता है, इसीलिए सर्वप्रथम पूजा गणेश जी की नियत हो गयी। श्रेष्ठता क्रम उपर्युक्त जो वर्णित है सामान्य स्थिति में तो यही क्रम नियत है परन्तु श्री विष्णु जी वाले शरीर के माध्यम से परमतत्त्वं (आत्मतत्त्वम्) रूप शब्द-ब्रह्म रूप परमब्रह्म परमेश्वर का अवतार हो गया, तब से श्रेष्ठ, सबसे उच्च और सबसे उत्तम स्थान श्री विष्णु जी को मिला और यह सर्वोच्चता सर्वश्रेष्ठता और सर्वोत्तमता तब तक रही जब तक कि अगली बार पुनः परमेश्वर का अवतरण नहीं हुआ था। जैसे ही श्री रामचन्द्र जी महाराज वाली शरीर से अवतरण हो गया, श्री विष्णु जी वाली विशेषता श्री रामचन्द्र जी में चली गयी और उनमें भी तब तक रही जब तक कि पुनः वही परमतत्त्वं (आत्मतत्त्वम्) रूप शब्द-ब्रह्म का अगला अवतरण नहीं हुआ, और जैसे ही श्री कृष्ण जी महाराज वाले शरीर से अवतरण हो गया तो श्री राम जी वाली विशेषताएँ श्रीकृष्ण जी महाराज में आ गयीं और उनके नाम पर तब तक रहीं, जब तक कि पुनः उसी परमतत्त्वं (आत्मतत्त्वम्) रूप शब्द-ब्रह्म) रूपी परमेश्वर जिनका जो अवतरण हुआ है, घोषित नहीं हो जाता कि अमुक शरीर से वर्तमान में अवतरण हुआ है। यह बात भी सत्य ही है कि परमब्रह्म परमेश्वर के अवतरण वाले शरीर की घोषणा और मान्यता कोई अन्य व्यक्ति नहीं करता। यह घोषणा और मान्यता भी स्वयं उसी के द्वारा ही होती है। अब वह समय भी अति निकट ही है जब परमेश्वर के वर्तमान अवतरण वाले शरीर की घोषणा सर्वविदित हो जाएगी

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